ये सुहबत का देखो असर हो रहा है : डॉ. विजय सुखवानी

उज्जैन, ये सुहबत का देखो असर हो रहा है, हर इक गाँव अब तो शहर हो रहा है… डॉ. विजय सुखवानी की इस शानदार ग़ज़ल से ग़ज़लांजलि साहित्यिक संस्था की काव्य-गोष्ठी प्रारम्भ हुई। डॉ. श्रीकृष्ण जोशी की अध्यक्षता में अशोक रक्ताले ने जो मुल्क बेच दे वो कयादत न थी कभी, ऐसी तो आजतक ये सियासत न थी कभी…ग़ज़ल पढ़ी। धीरे-धीरे यही चरित्र हो जाता है व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब…जीवन की सच्चाइयों पर यह कविता विनोद काबरा ने पढ़ी। शहर में ठण्ड का असर दिखने लगा है और तब प्रफुल्ल शुक्ल ने कविता पढ़ी कविता मेरी कौन पढ़ेगा मन में उठा विचार, ढूँढने बैठे तो ऐसे इंसा मिल गये चार… कविता के दौर को आगे बढ़ाते हुए सत्यनारायण सत्येन्द्र ने देश प्रेम और भक्ति के गीत गुनगुनाता हूँ मैं… रचना से कवियों का उत्साह बढ़ाया। एक निमाड़ी कविता दुई-दुई का परिवार हुई गया, रिश्ता सब छारमछार हुई गया… अक्षय चवरे ने पढ़ी। श्रमिकों की पीड़ाओं पर कविता डॉ. आर.पी. तिवारी ने पढ़ी वर्षा जल सा बहता पसीना, फिर भी ताने सीना, मिट्टी खोदते मज़दूर, ढोती मजदूरनी…पुन: ग़ज़ल की ओर बढ़ते हुए व्ही.एस. गहलोत साकित ने दिल यूँ बेबस हुआ के मचल न सका, दस्ते महरूमियों से निकल न सका… ग़ज़ल पढ़ी। शायर आशीष अश्क ने तेरे दिल में ही हिफ़ाज़त इसकी है, अपना ये दिल और मैं रक्खूँ कहाँ… ने पढ़ी तो कार्यक्रम की अंतिम रचना राह में ज़ीस्त की धोके तो बहुत खाए हैं, हुनर भी जीने का इनसे ही सीख पाए हैं…ग़ज़ल डॉ. अखिलेश चौरे ने पढ़ी।