उज्जैन, प्राचीनकाल से ही भारतीय सनातनीय परंपरा की मूल भाषा संस्कृत रही है, भारत के प्रत्येक गांव प्रत्येक घर तक संस्कृत का प्रचार व्यवहार हुआ करता था। इस परंपरा को पुनर्स्थापित करने के लिए हर घर में संस्कृत का व्यवहार हो, ऐसे उक्त विचार पीपलीनाका स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर सभागार में पौरोहित्य संस्कृत कार्यशाला के समापन सत्र के अवसर पर सत्राध्यक्षता कर रहे महर्षि पाणिनि संस्कृत वैदिक विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रो. शिव शंकर मिश्रा ने कहे। स्मृति विज्ञान अवंतिका शोध समिति उज्जैन एवं संस्कृत भारती मालवा प्रांत के संयुक्त तत्वाधान में सप्त दिवसीय पौरोहित्य संस्कृत प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया था। जिसमें सारस्वत अतिथि के रूप में महर्षि सांदीपनि वेद विद्या प्रतिष्ठान के कुल सचिव डॉ. विरुपाक्ष जड़्डीपाल, मुख्य अतिथि के रूप में कालिदास संस्कृत अकादमी के निदेशक महामहोउपाध्याय डॉ. गोविंद गंधे, विशिष्ट अतिथि डॉ. भरत बैरागी पूर्व अध्यक्ष पतंजलि संस्कृत बोर्ड भोपाल रहे।
उपस्थित सभी अतिथियों द्वारा सर्वप्रथम मां सरस्वती को माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलन किया। पं. रितेश व्यास, पं. गौरव शर्मा एवं आचार्य धर्मेन्द्र शर्मा द्वारा यजुर्वेद, सामवेद के मंत्रों द्वारा स्वस्ति वाचन किया गया। संस्था के सदस्यों ने उपस्थित अतिथियों का शाल श्रीफल पुष्प माला आदि से स्वागत किया। संस्था के अध्यक्ष दुर्गेश तारे ने शब्दाभिनन्दन कर सभी अतिथियों का स्वागत परिचय किया। संस्था के संस्थापक डॉ. गोपाल कृष्ण शुक्ल द्वारा संस्था की समस्त गतिविधि तथा संस्था के कार्य योजना सभा के सम्मुख रखी। इस अवसर पर कार्यशाला के मुख्य प्रशिक्षक उपेंद्र भार्गव विभाग अध्यक्ष ज्योतिष पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय का संस्था एवं उपस्थित अतिथियों द्वारा स्वागत अभिनंदन पत्र देकर किया गया एवं नीलकंठ महादेव के प्रधान पुजारी देवेन्द्र प्रताप व्यास का भी संस्था एवं अतिथियों द्वारा स्वागत अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम का संचालन आचार्य सर्वेश्वर शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम मुख्य रूप से दिलीप ज्ञानी, स्थान के पुजारी सपन व्यास उपस्थित रहे। इस कार्यशाला में 60 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया एवं अतिथियों द्वारा प्रमाण पत्र प्राप्त किए। समापन सत्र का आभार व्यक्त संस्था के सचिव पं. रामचंद्र नायक ने माना।
