मकर संक्रांति पर निरंकारी भक्तों ने भक्ति भाव से सरोकार होकर मनाया भक्ति पर्व

उज्जैन, भक्ति केवल शब्द नहीं जीवन जीने की सजग यात्रा है। यह वचन निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी ने मकर संक्रांति के पर्व पर समालखा में आयोजित एक सत्संग में कही। निरंकारी भक्तों ने मकर संक्रांति पर अपने गुरु के आशीष वचनों को जहन में उतारा वही खाचरोद में भी समागम का आयोजन किया गया जिसमें सैकड़ों निरंकारी भक्त शामिल थे।
जानकारी देते हुए बताया कि मीडिया सहायक विनोद गज्जर ने भक्ति पर्व पर अनेक वक्ताओं, कवियों और गीतकारों ने विभिन्न विद्याओं के माध्यम से गुरु महिमा और भक्ति का भावपूर्ण वर्णन किया। संतों की प्रेरणादायक शिक्षाओं ने श्रद्धालुओं के जीवन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समृद्ध किया, वहीं समर्पित संत सन्तोख सिंह जी सहित अन्य संत भक्तों के तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में उनके अमूल्य योगदान को स्मरण किया गया और उनके जीवन से प्रेरणा ली गईं।
मुख्य आयोजन हरियाणा के समालखा स्थित निरंकारी आध्यात्मिक स्थल पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं आदरणीय निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में हुआ, जिसमें श्रद्धा और भक्ति की अनुपम छटा देखने को मिली। देश-विदेश के हजारों श्रद्धालुओं के साथ मथुरा के भी तमाम भक्त इस दिव्य संत समागम में सम्मिलित हुए और सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद की दिव्य अनुभूति प्राप्त की।
समालखा में हुए भक्ति पर्व समागम में भक्ति की महिमा पर प्रकाश डालते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा जी ने कहा कि भक्ति कोई नाम या दिखावा नहीं, बल्कि अपने भीतर की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति तब है जब हम आत्म मंथन द्वारा दूसरों से पहले स्वयं को जाँचें, अपनी कमियों को सुधारें और हर पल जागरूक जीवन जिएँ। अज्ञान में हुई गलती सुधर सकती है, पर जानबूझकर चोट पहुँचाना, बहाने या चालाकी शब्द भक्ति नहीं हैं, क्योंकि भक्त का स्वभाव मरहम का होता है। हर एक में निराकार परमात्मा को देखकर सरल, निष्कपट व्यवहार करना और ब्रह्मज्ञान के बाद सेवा, सुमिरन व सत्संग से इस एहसास को बनाए रखना ही भक्ति है।
इस मौके पर निरंकारी राजपिता रमित जी ने भक्ति पर्व के अवसर पर यह समझाया कि भक्ति कोई पद, पहचान या अपनी बनाई परिभाषा नहीं, बल्कि ब्रह्मज्ञान पाकर करता-भाव के समाप्त होने से उपजा जीवन जीने का ढंग है। संतों ने वचन इसलिए माने क्योंकि गुरु का वचन मानना उनके लिए स्वाभाविक था, जबकि हम कई बार न मानने को भी सही ठहरा लेते हैं। सत्य और भक्ति की परिभाषा एक ही है, यदि भक्ति को उपलब्धियों या अहंकार से जोड़ा जाए तो करता – भाव जीवित रहता है। भक्ति कोई सौदा नहीं, प्रेम का चुनाव है, जहाँ प्रयास रहते हैं पर दावा नहीं इसलिए अरदास यही है कि अपनी सारी परिभाषाएँ छोड़कर ऐसा जीवन जिएँ जहाँ वचन, सेवा, सुमिरन और संगत स्वभाव बन जाएँ क्योंकि भक्ति अपनी परिभाषा से हो, तो भक्ति नहीं। आगे मिडिया सहायक विनोद गज्जर ने बताया कि उज्जैन के मुखी त्रिलोक बेलानी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि निरंकारी मिशन का मूल सिद्धांत यही है कि भक्ति, परमात्मा के तत्व को जानकर ही अपने वास्तविक एवं सार्थक स्वरूप को प्राप्त करती है। निःसंदेह, सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के अमूल्य प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को ब्रह्मज्ञान के माध्यम से भक्ति के वास्तविक अर्थ को समझने तथा उसे अपने दैनिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्रदान की।